निकलकर आज स्वप्नों की दुनिया से ,
ज़िन्दगी के उस दोराह पर हूँ |
जहाँ एक ओर मेरे स्वपन ,
और एक ओर जीवन का यथार्थ |
कल्पनाओ का साथ छूट रहा है ,
और सत्य मेरे सामने खड़ा है |
स्वपन....
कितने मधुर , कल्पनाओ में उड़ान भरना कितना सुखद |
पर सत्य.....
कितना कटु ,
यथार्थ का सामना करना, कितना दुखद |
असमर्थ हूँ,
जीवन के इस मोड़ का सामना करने में |
सोचती हूँ लौट जाऊं उसी स्वपन लोक में,
पर ये स्वपन नहीं सच्चाई है |
काश मैं न बुनती कोई स्वपन , न ही करती कल्पनाये |
न उनसे कोई मोह होता , न उनके टूटने का गम |
जीवन सच है, स्वपन नहीं |
ये मैंने जाना होता |
तब कर पाती सत्य का सामना,
सत्य को स्वीकार पाती|
मेरे सामने ज़िन्दगी दोराह न होती,
काश...
काश, मैं स्वप्नों की दुनिया में खोयी ही न होती....
"जिज्ञासा"
hey once again...im here first to comment...he he...
ReplyDeleterly nice one hun!!
luvd it..bt why senti senti?????
aah!!
bt its rly simply superbbb...
keep posting more...luv to read ur blog....
-swati :)