ज़िन्दगी एक किताब है , शायद..
मेरी ज़िन्दगी के पन्नो पर,
सबने लिखा जो मन में आया |
किसी ने ख़ुशी उड़ेल दी , तो किसी ने गम,
किसी ने स्याही उड़ेल,
कुछ धब्बे अंकित करने चाहे..|
किसी ने पन्नो को फाड़,
खुद से जोड़ना चाहा ...
मैं नादान, नासमज ...
उनके अर्थ को न समझ सकी..|
आज दिल में टीस उठती है,
काश उस वक़्त मुझे यह अधिकार होता...
पर..
आज मेरी कलम मेरे हाथ है ,
लिख सकती हूँ,जो चाहती हूँ |
पर...
शायद , आज भी स्वतंत्र नहीं ,
कुछ दाग दिल पर लगे है...|
क्यूँ अधिकार है सबको, दूसरो से खिलवाड़ करने का...|
टीस उठती है दिल से,
पर दफ़न है दिल के कोने में कहीं...|
आज भी,
मेरी भावनाओ , कल्पनाओ का..
उन पन्नो पर कोई अस्तित्व नहीं,
क्या...,
ये सब व्यक्त नहीं होती..|
क्यूँ..,
ये सब व्यक्त नहीं होती....???
"जिज्ञासा"
awwwwwwwww....first to comment....
ReplyDeleteho ho ho...
sab kuchh likh k bi vyakt nahi hoti...sorry...just kidding..
btw the poem is awesome....simply superbbbb
luvd it...
keep rocking!!
keep shining!!
waiting for more....
luv ya..
-swati :)
i hav nothing to say...
ReplyDeletethere are no words in my dictionary to make any complement...
thanks 2 both of u.. :)
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