Tuesday, August 17, 2010

भावनाएँ व्यक्त नहीं होती ......

ज़िन्दगी एक किताब है , शायद..
मेरी ज़िन्दगी के पन्नो पर,
सबने लिखा जो मन में आया |


किसी ने ख़ुशी उड़ेल दी , तो किसी ने गम,
किसी ने स्याही उड़ेल,
 कुछ धब्बे अंकित करने चाहे..|


किसी ने पन्नो को फाड़,
खुद से जोड़ना चाहा  ...
मैं नादान, नासमज ...
उनके अर्थ को न समझ सकी..|


आज दिल में टीस उठती है,
काश उस वक़्त मुझे  यह अधिकार होता...


पर..
आज मेरी कलम मेरे हाथ है ,
लिख सकती हूँ,जो चाहती हूँ |
पर...
शायद , आज भी स्वतंत्र नहीं ,
कुछ दाग दिल पर लगे है...|


क्यूँ अधिकार है सबको, दूसरो से खिलवाड़ करने का...|
टीस उठती है दिल से,
पर दफ़न है दिल के कोने में कहीं...|


आज भी,
मेरी भावनाओ , कल्पनाओ का..
उन पन्नो पर कोई अस्तित्व नहीं,


क्या...,
ये सब व्यक्त नहीं होती..|


क्यूँ..,
ये सब व्यक्त नहीं होती....???


                                 "जिज्ञासा" 

3 comments:

  1. awwwwwwwww....first to comment....
    ho ho ho...
    sab kuchh likh k bi vyakt nahi hoti...sorry...just kidding..
    btw the poem is awesome....simply superbbbb
    luvd it...
    keep rocking!!
    keep shining!!
    waiting for more....
    luv ya..

    -swati :)

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  2. i hav nothing to say...
    there are no words in my dictionary to make any complement...

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