कुछ खोज रही हूँ आज,
जीवन के अनमोल क्षण ,
वो खुशियाँ ,
फिसलती गयी मेरे हाथो से ,
मुट्ठी में बंद बालू जैसे |
(कुछ - कुछ जीवन भी इस तट जैसा ही है ना |)
कभी होते है सुनहरे पल,
ठीक चाँदनी में चमकती बालू जैसे,
कभी अनमोल शान्ति,
सागर की अथाह गहराई जैसे,
सागर की ऊँची - ऊँची लहरों में,
कभी - कभी कोई सब कुछ बहा ले जाता है |
पर क्या ये बस समाप्ति का सूचक है......... ?
नहीं...,
ये नवजीवन के प्रारंभ का संकेत भी तो है |
"जिज्ञासा"
वो खुशियाँ ,
फिसलती गयी मेरे हाथो से ,
मुट्ठी में बंद बालू जैसे |
(कुछ - कुछ जीवन भी इस तट जैसा ही है ना |)
कभी होते है सुनहरे पल,
ठीक चाँदनी में चमकती बालू जैसे,
कभी अनमोल शान्ति,
सागर की अथाह गहराई जैसे,
सागर की ऊँची - ऊँची लहरों में,
कभी - कभी कोई सब कुछ बहा ले जाता है |
पर क्या ये बस समाप्ति का सूचक है......... ?
नहीं...,
ये नवजीवन के प्रारंभ का संकेत भी तो है |
"जिज्ञासा"
निराशा के क्षणों में भी जीवन की प्रगति देख पाना बहुत बड़ा दर्शन है. कोमल भावनाओं को बहुत सटीक शब्दों में पिरोया है. अच्छी लगी तुम्हारी कविता!
ReplyDeleteस्वर्णिमा "अग्नि"
hi..
ReplyDeletewell im totally speecgless abt this poem...
its rly fabulous..
bt i think u know den when i read its first line wat did i feel...ha ha ha ha ha.....
thanku both..thnx a lot for ur appreciation ..
ReplyDelete@ swati : i knw..wat u felt ??
Dear nice one....cn see d diversion in ur poems.........feels good dt u ended wid +ve note....Keep it up :)
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeletewow !! amazing ... itani achchi kavita :) whole kavita is taking me some where in my life :)
ReplyDeletethanku rashi :)
ReplyDeletethnx santosh... try 2 understand d end den u'll find the meaning of ur life :)